भारत की आत्मा उसकी सनातन संस्कृति में निवास करती है। यह संस्कृति केवल हमारे मंदिरों, तीर्थों और ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे विचार, व्यवहार, परिवार, समाज और राष्ट्र-जीवन में अभिव्यक्त होती है। यदि भारत को उसके वास्तविक स्वरूप में समझना है, तो श्रीराम के आदर्शों और माँ जानकी के दिव्य चरित्र को समझना आवश्यक है। श्रीराम मर्यादा, न्याय, करुणा और राष्ट्रधर्म के प्रतीक हैं, वहीं जगज्जननी माँ सीता शक्ति, त्याग, धैर्य, आत्मबल और मातृत्व की परम प्रतिमूर्ति हैं। यही कारण है कि रामायण आज भी केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए जीवन-दर्शन है।
रामायण रिसर्च काउंसिल का संकल्प इसी जीवन-दर्शन को जन-जन तक पहुँचाना है। हमारा विश्वास है कि यदि रामायण घर-घर पहुँचेगी, तो संस्कार समाज में लौटेंगे; यदि माँ सीता के आदर्श पुनः प्रतिष्ठित होंगे, तो नारी का सम्मान और शक्ति दोनों पुनर्जीवित होंगे; और यदि श्रीराम के विचार जनमानस में स्थापित होंगे, तो राष्ट्र पुनः नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक वैभव की ओर अग्रसर होगा।
इसी उद्देश्य से काउंसिल ने अनेक दूरदर्शी प्रकल्प प्रारंभ किए हैं। “श्रीरामलला – मन से मंदिर तक” अभियान का उद्देश्य केवल अयोध्या में बने दिव्य-भव्य मंदिर का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय के मन-मंदिर में श्रीराम के आदर्शों की स्थापना करना है।
काउंसिल का एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय संकल्प है “सीतामढ़ी को शक्ति-क्षेत्र के रूप में विकसित करना।” मिथिला की पावन धरती केवल माँ जानकी की जन्मभूमि ही नहीं, बल्कि भारतीय नारी-शक्ति, करुणा, धैर्य और आत्मबल की वैश्विक प्रेरणा है। हमारा प्रयास है कि सीतामढ़ी को केवल धार्मिक पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि शक्ति, संस्कृति, शोध, नारी-जागरण और आध्यात्मिक चेतना के विश्वस्तरीय केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित किया जाए, जहाँ से माँ जानकी के जीवन-मूल्य सम्पूर्ण विश्व तक पहुँचें।
भविष्य का भारत तभी सशक्त होगा जब उसके बच्चों के भीतर संस्कारों का बीजारोपण होगा। इसी भावना से “रामायण मंच” की स्थापना की गई है। इसका उद्देश्य बालकों और युवाओं में रामायण के आदर्शों, भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों, वक्तृत्व-कला, अभिनय, संगीत और चरित्र-निर्माण का विकास करना है।
रामायण की परंपरा को जीवित रखने वाले विद्वानों, शोधकर्ताओं, कथावाचकों, साहित्यकारों, कलाकारों तथा समाजसेवियों के सम्मान हेतु “रामायणी सम्मान” का आयोजन किया जा रहा है।
देवभाषा संस्कृत के प्रचार-प्रसार और रामायण-विमर्श को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से काउंसिल ने “रामायण वार्ता” का शुभारंभ किया है। यह केवल एक पत्रिका या संवाद-मंच नहीं, बल्कि रामायण-चिंतन, संस्कृत-संवर्धन, शोध, विमर्श और सांस्कृतिक जागरण का सशक्त माध्यम है। हमारा प्रयास है कि संस्कृत पुनः जनभाषा के रूप में सम्मान पाए और नई पीढ़ी अपनी मूल ज्ञान-परंपरा से जुड़ सके।
आज समाज अनेक प्रकार के संकटों से जूझ रहा है। परिवार बिखर रहे हैं, संस्कार क्षीण हो रहे हैं, जीवन में संयम और संवेदना का अभाव दिखाई देता है। ऐसे समय में केवल आलोचना नहीं, बल्कि सकारात्मक सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है। यही रामायण रिसर्च काउंसिल का उद्देश्य है—समाज को उसके मूल स्वरूप से पुनः जोड़ना।
आइए, हम सब मिलकर ऐसा भारत निर्मित करें जहाँ श्रीराम की मर्यादा जीवन का आधार बने, माँ जानकी का आदर्श नारी-सम्मान का मानक बने, संस्कार हमारी पहचान बनें, संस्कृति हमारी शक्ति बने और आने वाली पीढ़ियाँ गर्व से कह सकें कि उन्होंने भारत की सनातन विरासत को केवल पढ़ा नहीं, बल्कि जिया भी है।
॥ जय श्री सीताराम ॥ जय माई ।।
रामायण हमारे लिए केवल श्रद्धा का विषय नहीं है; यह भारत की सांस्कृतिक अस्मिता का जीवंत दस्तावेज़ है। इसमें शासन की मर्यादा है, समाज की संवेदना है, परिवार की आत्मीयता है, नारी के गौरव का सर्वोच्च आदर्श है और मानवता के लिए करुणा का अमृत संदेश है। यही कारण है कि समय बदलने पर भी रामायण की प्रासंगिकता कभी कम नहीं होती।
आज आवश्यकता केवल रामायण पढ़ने की नहीं, बल्कि रामायण को समाज की चेतना में पुनः प्रतिष्ठित करने की है। यही कार्य अत्यंत समर्पण के साथ रामायण रिसर्च काउंसिल कर रही है। यह संस्था शोध और परंपरा, आस्था और अकादमिक विमर्श, संस्कृति और सामाजिक उत्तरदायित्व—इन सभी को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास कर रही है। मुझे विश्वास है कि आने वाले समय में यह केवल एक संस्था नहीं, बल्कि भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र सिद्ध होगी।
काउंसिल के जिन प्रकल्पों ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया है, उनमें अयोध्या में श्रीराम-मंदिर संघर्ष पर ग्रंथ “श्रीरामलला—मन से मंदिर तक” अभियान अत्यंत प्रेरणादायी है। अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण भारत की सामूहिक आस्था की अभिव्यक्ति है, किंतु उससे भी बड़ा कार्य प्रत्येक भारतीय के मन में श्रीराम के आदर्शों का मंदिर निर्मित करना है। यदि मर्यादा, सत्य, सेवा और लोकमंगल हमारे जीवन का स्वभाव बन जाएँ, तो वही इस अभियान की वास्तविक सफलता होगी।
इसी प्रकार सीतामढ़ी को शक्ति-क्षेत्र के रूप में विकसित करने का संकल्प अत्यंत दूरदर्शी है। रामायण वार्ता के माध्यम से संस्कृत और भारतीय ज्ञान-परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान करने का प्रयास वास्तव में एक समग्र सांस्कृतिक दृष्टि का परिचायक है। यही वे प्रयास हैं जो समाज में स्थायी परिवर्तन की आधारशिला रखते हैं।
आज आवश्यकता ऐसे अभियानों की है जो समाज को जोड़ें, पीढ़ियों को जोड़ें और भारत को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ें। संस्कृति केवल स्मृति नहीं होती; वह भविष्य का भी निर्माण करती है। जिस राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना जागृत रहती है, उसकी राष्ट्रीय चेतना भी सदैव प्रखर रहती है।
मैं संत समाज, विद्वानों, शिक्षकों, विश्वविद्यालयों, युवाओं, मातृशक्ति, सामाजिक संस्थाओं, उद्योग जगत और देश-विदेश में रहने वाले सभी भारतीयों से आग्रह करता हूँ कि वे इस अभियान को अपना अभियान समझें। रामायण रिसर्च काउंसिल के प्रकल्पों से जुड़ें, अपने परिवारों में रामायण अध्ययन की परंपरा को पुनर्जीवित करें, बच्चों को संस्कारों से जोड़ें और भारत की इस अमूल्य धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक और अधिक समृद्ध रूप में पहुँचाने का संकल्प लें।
आइए, हम सब मिलकर ऐसा भारत गढ़ें जहाँ विकास की ऊँचाइयों के साथ संस्कृति की गहराई भी बनी रहे; जहाँ आधुनिकता हमारी गति बने और सनातन संस्कृति हमारी दिशा।
॥ जय श्री सीताराम ॥
जब कोई संकल्प केवल एक विचार नहीं रहता, बल्कि समाज के जीवन में परिवर्तन का माध्यम बनने लगता है, तब वह एक अभियान बन जाता है। रामायण रिसर्च काउंसिल मेरे लिए केवल एक संस्था नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम और जगज्जननी माँ जानकी की प्रेरणा से प्रारम्भ हुआ एक सांस्कृतिक संकल्प है। यह संकल्प उस भारत के पुनर्जागरण का है, जिसकी आत्मा रामायण में बसती है और जिसकी संस्कृति मर्यादा, सेवा, समरसता तथा करुणा पर आधारित है।
आज हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहाँ अभूतपूर्व भौतिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियाँ भी हमारे सामने हैं। मेरा दृढ़ विश्वास है कि इन चुनौतियों का स्थायी समाधान केवल नीतियों से नहीं, बल्कि संस्कारों से निकलेगा, और उन संस्कारों का सबसे सशक्त स्रोत है—रामायण।
इसी विश्वास के साथ रामायण रिसर्च काउंसिल की स्थापना का उद्देश्य केवल रामायण पर शोध करना नहीं था, बल्कि रामायण को पुनः जनजीवन का मार्गदर्शक बनाना था। इसी दृष्टि से काउंसिल ने अनेक महत्त्वपूर्ण प्रकल्प प्रारम्भ किए हैं। मैंने जब अयोध्या में श्रीराम-मंदिर संघर्ष पर ग्रंथ लिखना प्रारंभ किया तो बाधाएं अनंत थीं। कैसे पूरा होगा पता न था, परंतु जब तक मन में किसी के सहयोग की आस थी, तब तक कोई कार्य न हुआ, लेकिन आती गई एक से एक विकट परेशानियों के बीच जब एक मात्र प्रभु ही आसरा बचे, तब प्रभु ने हाथ थामा। और तभी ग्रंथ “श्रीरामलला—मन से मंदिर तक” पूर्ण हुआ।
काउंसिल के तत्त्वावधान में सीतामढ़ी को शक्ति-क्षेत्र के रूप में विकसित करने वाला विषय भी साक्षात ईश्वर-प्रदत्त है। इसका विवरण- ‘मां जानकी का आदेश : स्वप्न से संकल्प तक’ में आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा हेतु समपर्पित रहेगा।
यदि हमें भारत का भविष्य सुरक्षित करना है तो हमें अपने बच्चों को केवल करियर नहीं, चरित्र भी देना होगा। इसी उद्देश्य से “रामायण मंच” की परिकल्पना की गई है। रामायण की परंपरा को जीवित रखने वाले संतों, विद्वानों, शोधकर्ताओं, कथावाचकों, साहित्यकारों और समाजसेवियों के सम्मान हेतु “रामायणी सम्मान” की स्थापना की गई है। हमारी प्राचीन ज्ञान-परंपरा का मूल स्रोत संस्कृत है। इसलिए “रामायण वार्ता” के माध्यम से हम संस्कृत भाषा, रामायण विमर्श, शोध और सांस्कृतिक संवाद को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सतत प्रयास कर रहे हैं।
इन सब प्रयासों के पीछे एक ही भावना है—रामायण को पुस्तक से व्यवहार तक और परंपरा से भविष्य तक ले जाना। जब तक रामायण केवल अलमारियों में रहेगी, तब तक उसका प्रभाव सीमित रहेगा; लेकिन जब वह जीवन का हिस्सा बनेगी, तब समाज का चरित्र स्वयं बदलने लगेगा।
यह अभियान किसी एक व्यक्ति या संस्था का नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा को पुनः जागृत करने का अभियान है। यदि हम सब मिलकर एक-एक दीप जलाएँगे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कार, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का एक उज्ज्वल भविष्य निर्मित होगा।
आइए, हम सब मिलकर ऐसा भारत बनाएं जहाँ श्रीराम की मर्यादा जीवन का आदर्श हो, माँ जानकी का गौरव प्रत्येक बेटी की प्रेरणा बने, संस्कृत पुनः सम्मान के साथ बोली और पढ़ी जाए, और रामायण केवल पूजनीय ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की सर्वश्रेष्ठ पद्धति के रूप में स्थापित हो।
इसी विश्वास, इसी संकल्प और इसी आस्था के साथ मैं आप सभी से इस राष्ट्रव्यापी सांस्कृतिक यात्रा में सहभागी बनने का आग्रह करता हूँ।
॥ जय श्री सीताराम ॥
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